‘The Dhandho Investor’ Book Summary in Hindi

'The Dhandho Investor' Book Summary in Hindi

इंडिया में हमारे पास गुजराती मारवाड़ी सिंधी जैसी कुछ कम्युनिटी से जो बिजनेस में अपने झंडे गाड़ चुकी हैं। तो आइए इस पोस्ट में हम मोहनीश बाबराई की बुक The Dhandho Investor से जानते हैं कि ईन कम्यूनिटी के पास ऐसा कौन सा फॉर्म्युला है जो बिजनेस में उन्हें इतना रिच बनाता है।

अपने स्टॉक मार्केट में सुना होगा कि हायर रिटर्न चाहिए तो आपको हाई रिस्क लेना पड़ेगा। लेकिन गुजराती कुछ अलग सोचते हैं। उन्हें तलाश होती है ऐसीमैट्रिक्स ऑपर्च्युनिटी वाले बिजनेस की जिसमें अगर वो जीते तो बहुत फायदा हो और अगर फेल हो तो उनको कुछ खास फर्क ना पड़े और यही है क्लासिक धन्धो स्टाइल।

Story to understand The Dhandho Framework

क्या आप जानते हो अमेरिका में रहने वाला गुजराती एक एवरेज अमेरिकन से भी ज्यादा कमाता है। अगर हम देखें तो यूएस की सिर्फ 1% पॉपुलेशन ही इंडियन है और इसी 1% में थोड़े से है गुजराती पटेल। लेकिन हैरान कर देने वाली बात यह है कि इतने थोड़े लोग ही अमेरिका के फिफ्टी परसेंट से ज्यादा मोटेल बिजनेस के मालिक हैं। तो सबसे पहले जानते हैं कि पटेल अमेरिका पहुंचे कैसे और क्यों उन्होंने मोटेल बिजनेस को ही चुना।

जैसे ज्यादातर लोग गांव से खेती छोड़कर शहर आते हैं क्योंकि हर जेनरेशन के बाद होने वाली जमीन के बंटवारे में बहुत कम या ना के बराबर जमीन बचती है। और इसी रीजन से कुछ गुजराती पटेल का ग्रुप बिजनेस करने के लिए युगांडा चला गया और वहां उन्होंने बहुत अच्छा बिजनेस किया और अच्छी खासी वेल्थ भी बनाई। लेकिन तभी 1972 में युगांडा में एक डिक्टेटर पावर में आया जिसने गुजराती पटेल की तरक्की देख की उनकी सारी दौलत छीन ली और उन्हें युगांडा से निकाल दीया।

अब इस सिचुएशन में युगांडा से निकालिए पटेल को कोई नई जगह और बिजनेस की तलाश थी। इसीलिए कुछ पटेल अपनी बची खुची वेल्थ लेकर यूके कैनेडा और अमेरिका में जाकर सेटल हो गए। पर क्यों कि गुजराती पटेल से ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे इसीलिए जब 1973 में वो अमेरिका पहुंचे तो ब्रोकन इंग्लिश के साथ अमेरिका में व्हाइट कॉलर जॉब करना उनके बस की बात नहीं थी।

पर तभी अरब के कुछ देशों में कॉन्फ्लिक्ट की वजह से अमेरिका में oil क्राइसिस भी चालू था, जिसकी वजह से पेट्रोल के दाम बहुत बढ़ गए थे। लोगों ने घूमना फिरना और ट्रैवल करना बंद कर दिया था। जिसकी वजह से मोटेल बिजनेस यानी हाइवे पर बने 20 से 25 कमरे वाले छोटे होटेल्स की हालत काफी खराब थी और बहुत से मोटेल ओनर्स अपने मॉडल बिजनेस बेचने लगे थे। जिससे मोटल्स की प्राइस गिर के बहुत सस्ती हो गई थी और जो मोटेल्स बिजनेस खरीदना चाहते थे बैंक उनको 90% लोन दे रही थी। और युगांडा से निकलने के बाद पटेल के पास ना ही बहुत ज्यादा सेविंग थी और ना ही रहने के लिए घर।

तो इन गुजराती पटेल ने 90% लोन बैंक से लेकर और अपनी बची खुची सेविंग्स का डाउन पेमेंट करके मोटेल खरीदे। उनको पता था कि ये प्रॉब्लम टेम्पररी है। थोड़े टाइम बाद जब मार्केट की हवा बदलेगी तो सब फिर से नॉर्मल हो जाएगा। पटेल के पास रहने के लिए घर नहीं था तो मोटेल के एक कमरे में उनकी फैमिली रहती और होटल के स्टाफ को निकाल के वो घर के फैमिली मेंबर्स या मोटेल का कामकाज करने लगे।

तो इस तरह उन्होंने मोटेल बिजनेस को एक लो कॉस्ट बिजनेस में कनवर्ट कर दिया ताकि वो इस क्राइसिस में सर्वाइव कर सकें। फाइनली oil क्राइसिस खत्म हुए और मोटेल्स से पटेल को अच्छा खासा प्रॉफिट होने लगा और देखते ही देखते वो मोटेल बिजनेस के मालिक बन गए।

ये स्टोरी बहुत ही इम्पॉर्टेंट है धन्धो फ्रेमवर्क समझने के लिए तो आइए समझते हैं क्लासिक धन्धो फ्रेमवर्क के वो 6 रूल्स जिन्हें फॉलो करके गुजराती और मारवाड़ी कम्युनिटी इतनी रिच बनती है।

Rull No 1: Buy Existing Business

जैसा कि हम सब जानते हैं कि किसी भी बिजनेस को स्टार्ट करने में बहुत टाइम लगता है और इतने एफर्ट लगाने के बाद भी यह जरूरी नहीं कि आपको बिजनेस में अच्छा प्रॉफिट हो। इसीलिए पटेल ने एग्जिस्टिंग मॉडल बिजनेस को ही खरीदा। वो इनोवेशन करने नहीं गए क्योंकि इनोवेशन करने से पहले जरूरी है कि आपके पास थोड़ा बहुत कैपिटल हो।

जिससे आपने लगाए पैसे डूब जाएं तब भी आपको कुछ खास फर्क न पड़े। यानी नई नई कंपनी के स्टॉक खरीदने से बेहतर है आप उस कंपनी में इनवेस्ट करें जो कंपनी सालों से exist करती हो जिनकी मार्केट में अच्छी पोजिशन हो और जिनका बिजनेस मॉडल सही तरीके से काम कर रहा हो।

Rull No 2: Buy Business with ultra slow rate of change

वॉरेन बफेट कहते हैं कि-
Change is enemy of Investment.

इसीलिए हमें ऐसे बिजनेस में इनवेस्ट करना चाहिए जिसका रेट ऑफ चेंज बहुत ही स्लो हो। फोर एग्जाम्पल कोका कोला और मैक्डोनाल्ड आज से 20 साल पहले थे आज भी है और बहुत ज्यादा chances हैं कि आने वाले 20 साल के बाद भी वो मौजूद होंगे। लेकिन दूसरी तरफ अगर हम बात करें टिकटोक, फेसबुक, नेटफ्लिक्स जैसी टेक्नोलॉजी कंपनी की तो उनका कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि टेक्नोलॉजी कंपनी का रेट ऑफ चेंज बहुत हाई होता है।

आज से 20 साल पहले हम ऑरकुट और याहू यूज करते थे। आज हम फेसबुक यूज करते हैं क्या पता आने वाले सालों में गवर्नमेंट पॉलिसीज चेंज हो जाए जिससे कोई और प्लैटफॉर्म बूम में आए। इसलिए अपना कैपिटल उसी कंपनी में इनवेस्ट करें जिसमें रात चेंजेस होने के चांसेज ना के बराबर हों। क्योंकि इनवेस्टमेंट का फर्स्ट रूल है सेफ्टी ऑफ कैपिटल।

Rull No 3: Focus On Arbitrage

मान लीजिए कोई साड़ी मुंबई में 15 हजार में मिल रही है लेकिन वही सेम साड़ी सूरत में 10 हजार में मिलती हो। तो अगर हम सूरत से 10 हजार में साड़ी खरीद के मुंबई में 15 हजार में बेचते हैं और 5 हजार का प्रॉफिट कमाते हैं तो इसे आर्बिट्राज कहते है। अभी हमने जिस आर्बिट्राज की बात की वो प्लेसिस की आर्बिट्राज थी। मतलब दो जगह पे प्राइस के डिफरेंस को एक्सप्लॉयट करके हमने पैसे कमाए।

ये सेम चीज़ टाइम के साथ भी हो सकती है। फोर एग्जाम्पल गोल्ड की कीमत आज 50 हजार रुपये है और महीने बाद यह गोल्ड 55 हजार का होने वाला है। तो ऐसे में हम एक महीने बाद गोल्ड सेल करके प्रॉफिट earn करते हैं तो उसे आर्बिट्राज ऑफ टाइम कहेंगे। इसिलए आपको भी इनवेस्टिंग के दौरान आर्बिट्राज पे फोकस करना है।

Rull No 4: Buy Business at Big Discount

वॉरेन बफेट कहते है जब लोग लालची होकर इन्वेस्ट कर रहे हो तब आप थोड़ा डर जाओ। पर जब सब लोग डर कर अपने स्टॉक सेल कर रहे हों तब आप थोड़ा लालची हो कर उन स्टॉक्स को सस्ते में खरीद लो। इस तरह आपको स्टॉक तब buy करने चाहिए जब मार्केट डिस्ट्रेस कंडीशन में हो।

फॉर एग्जाम्पल 1987, 2008 या फिर रिसेंटली कोविड सिचुएशन में स्टॉक मार्केट बहुत ही नीचे चला गया था। अगर आपने उस टाइम मार्केट में इनवेस्ट किया होता तो अभी आप अच्छे खासे प्रॉफिट में होते। इनवेस्टिंग करते वक्त आपको कंपनी के वैल्यूएशन पर ध्यान देना चाहिए। जब कंपनियां इकोनॉमी खराब हालत में होती है तब कई बार अच्छी कंपनी सस्ते वैल्यूएशन पर मिल जाती है। जब कंपनी कीसी शॉर्ट टर्म प्रॉब्लम में फंस जाती है तब लोग उन कंपनियों के शेयर बेच देते हैं। जिससे वो बिजनेस सस्ते वैल्यूएशन पर मिल जाता है।

यहां पर हम किसी ऐरे गैरे बिजनेस की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं वो बिजनेस की जो फंडामेंटल्स स्ट्रॉन्ग हो और जिन्हें आप समझते हों। अगर वो बिजनेस किसी शॉर्ट टर्म प्रॉब्लम की वजह से खराब हालत में हैं और आप उस बिजनेस के लॉन्ग टर्म परफॉर्मेंस के बारे में कॉन्फिडेंट हों तब आप उस बिजनेस में इनवेस्ट कर सकते हो।

एक बात याद रखो इनवेस्टमेंट या बिजनेस में मिलने वाले रिटर्न्स आप कितने ज्यादा मार्जिन से स्टॉक बेच रहे हो उसमें नहीं लेकिन कितने ज्यादा डिस्काउंट पर स्टॉक खरीद रहे हो उस पर डिपेंड करता है।

फॉर एग्जाम्पल किसी प्रॉपर्टी का प्राइस अगर एक करोड़ रुपये है और उसे आप 80 लाख में खरीद रहे हों तो बाय करते टाइम भी आपका 20 लाख का प्रॉफिट हो गया।

Rull No 5: Buy Businesses with Moat

अगर आप किसी भी बिजनेस में अपना पैसा लगा रहे हो तो आपको यह पता होना चाहिए कि आपके बिजनेस में वो कौन सी खास बात है जो उसको अपने कॉम्पिटिटर से बेटर बनाती है जिसे ऑथर मोट कहते हैं। Moat मतलब किले की बड़ी बड़ी दीवारों के नजदीक बनाई हुई खाय। जिससे दुश्मन के अंदर आने के चांसेस ऑलमोस्ट ना के बराबर हो जाएं।

बिजनेस में moat कई तरह के हो सकते हैं जैसे कि इंडिया में आप आईआरसीटीसी जैसा कोई दूसरा रेलवे नेटवर्क नहीं बना सकते भले ही आपके पास कितने भी पैसे क्यों न हों क्योंकि उसे गवर्नमेंट ने प्रोटेक्ट करा है।

एग्जाम्पल के तौर पे आपकी किराना स्टोर है तो कोई भी आगे आपके स्टोर के सामने दूसरी स्टोर खोल सकता है क्योंकि उसमें गवर्नमेंट का कोई कंट्रोल नहीं है लेकिन अगर आपकी कंपनी सिविल एक्सप्लोसिव माने गोलाबारूद बनाती हो तो कोई भी ऐरा गिरोह के बम बनाने की फैक्ट्री नहीं लगा सकता क्योंकि गवर्मेंट ने कुछ ही कंपनियों को इसका लाइसेंस दिया हुआ है। पर ऑलमोस्ट ना के बराबर chances हैं कि वो किसी नई नई कंपनी को बम बनाने की परमिशन दे। तो एक तरह गवर्मेंट कुछ इंडस्ट्रीज को कॉम्पिटिशन से बचाती है और मोट की तरह काम करती है।

ब्रांड इमेज डायट एंड और डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क भी एक तरह की मोट ही है। जैसे कोई नई नहीं कंपनी के हैंड सेनिटाइजर कुछ खास नहीं बिकेंगे लेकिन वही हैंड सेनिटाइजर अगर रैकेट अपने ब्रांड डेटॉल के अंडर बेचे तो खूब बिकेंगे। क्योंकि उनके पास पहले से ही ब्रैंड इमेज का मोट है और कोई नई कंपनी के लिए उसे तोड़ना मुश्किल होगा। तो कोई भी शेयर खरीदने से पहले अब खुद से पूछिए कि क्या आपकी कंपनी के पास कोई कॉम्पिटिटिव एडवांटेज है भी या नहीं।

Rull No 6: Bet Heavily When Odds Are in your favour

चलो एक बैट लगाते हैं। हेड आया तो आपके पैसे डबल हो जाएंगे और अगर टेल आया तो आपने लगाए पैसे जीरो हो जाएंगे। इस सिचुएशन में अब सिंगल बेट में कितने पैसे लगाओगे।

वेल ऑथर ने एक फॉर्मूला बताया है जिसे kelly फॉर्मूला कहते हैं। जिसके हिसाब से इस सिचुएशन में आपको 20% पैसे सिंगल बेट में लगाने चाहिए। kelly फॉर्मूला के हिसाब से जब भी आपकी प्रॉफिट होने की प्रोबेबिलिटी ज्यादा हो तब आपको दबा के इन्वेस्ट करना है।

पटेल की बात करें तो जब उन्होंने मोटेल खरीदे तब उन्होंने सिर्फ 10% डाउनपेमेंट दिया था और बाकी का नाइटी पर्सेंट पैसा बैंक का था। अगर उनका बिजनेस फेल हो जाता तो ज्यादा से ज्यादा उनका क्या नुकसान होता। बस उनका थोड़ा डाउन पेमेंट ही तो जाता क्योंकि उसके अलावा उनके पास खोने को कुछ था ही नहीं।

यानी की odds टोटली उनके फेवर में थे और ऐसे टाइम में उन्होंने सारे पैसे लगा दिए और आगे भी जब फिर से रिसेशन आया जैसे कि 9/11 तब उन्होंने सेम प्रिंसिपल यूज़ करके बहोत इनवेस्ट किया और कई और मॉडल्स को भी सस्ते में खरीद लिए। यानी कि हर बार डाउन साइड बहुत कम था पर अप साइड बहुत ज्यादा।

इन्वेस्ट करते टाइम आपको भी ऐसा ही करना है और तब तक पैसे नहीं लगाने जब तक डील टोटली आपके फेवर में न हो। इसका मतलब है जब आपको पता हो कि ये स्टॉक आपको इंट्रिंसिक वैल्यू से बहुत सस्ते में मिल रहा है तब आपको जमकर इनवेस्ट करना है।

यानी कि Heads I win, tails I don’t loose much.

Conclusion

तो ये थे 6 प्रिंसिपल्स जिन्हें गुजराती और मारवाड़ी लोग फॉलो करके अपनी वेल्थ बढ़ाते रहते हैं। दोस्तो ये सारी बातें मैंने Mohnish Pabrai की बुक The Dhandho Investor से सीखी हैं। ये बुक वैल्यू इनवेस्टर के लिए बहुत अच्छी बुक है। अगर आप एक वैल्यू इनवेस्टर हों तो इसे जरूर पढ़ना, धन्यवाद।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *