Hyperfocus Book Summary in Hindi By Chris Bailey

Hyperfocus Book Summary in Hindi By Chris Bailey

Hyperfocus Book Summary: आज भी कई स्टील, ऑटोमोबाइल और एफएमसीजी कंपनी को बिलियन डॉलर बिजनेस बनने में बहुत स्ट्रगल करना पड़ता है। लेकिन टीकटोक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म कुछ ही सालों में बिलियन डॉलर बिजनेस बन जाते हैं। जानते हैं इसका रीजन क्या है इसका रीजन है हमारी अटेंशन इकोनॉमि। हिस्ट्री की शुरुआत में लोग खेती बाड़ी करके पैसे कमाते थे यानी कि एग्रीकल्चर इकोनॉमी थी। उसके बाद आई इंडस्ट्री इकोनॉमी और अभी हम अटेंशन इकोनॉमी में जी रहे हैं।

मेरे ये बोलने पर भी आपमें से कुछ लोग मानेंगे नहीं। तो चलिए अभी मैं आपको एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट करके दिखाता हूं कि हम अटेंशन इकोनॉमी में ही जी रहे हैं। अभी आप चाहे कहीं खड़े हों सोफे पर बैठे हों या अपने बेड पर लेटे हों अपने बॉडी के पोश्चर को नोटिस करो और कंफर्टेबल हो जाओ और आराम से एक गहरी सांस लें।

क्या आप हिले? आपने सांस ली? अगर हां तो भला आपने ऐसा क्यों किया? आप ग्लास और मेटल से बने टुकड़े को ही तो देख रहे हो और ये पोस्ट भी मैंने कब का बना के अपलोड कर दिया है लेकिन आज भी ये पोस्ट आपसे कुछ करवाता है क्योंकि अभी आपका अटेंशन इस पोस्ट पे है।

मुझे गलत मत समझना मेरा ये एक्सपेरिमेंट आपको सिर्फ यही बताने के लिए था कि आपका अटेंशन आपके पैसों से भी ज्यादा वैल्यूएबल है। आज एड मूवी, टीवी गानें, अखबार कंपनीज और सरकार सबको आपका अटेंशन चाहिए। जानते हो इसका रीजन क्या है? इसका रीजन है जब भी कोई चीज आपको अटेंशन गेन करके होल्ड कर पाती है तो वो धीरे धीरे आपके बिहेवियर को influence या manipulate भी कर सकती है।

बिजनेस से आपसे अपना सामान खरीदवा सकते हैं। politician आपसे वोट ले सकते हैं। आइडियोलॉजीस्ट और सो कॉल्ड रिलीजियस गुरु आपको उनकी कम्युनिटी का पार्ट बना सकते हैं। मतलब आपकी अटेंशन का पॉजिटिव इस्तेमाल भी हो सकता है और नेगेटिव इस्तेमाल भी हो सकता है।

Attention is the fundamental currency of today’s economy.

आज बहुत सारे लोगों के लिए किसी एक चीज पर थोड़े टाइम के लिए भी फोकस कर पाना बहुत मुश्किल हो गया है।

एक रिसर्च बताती है कि किसी वेबसाइट को खुलने में अगर 3 से 4 सेकंड का भी ज्यादा टाइम लगता है तो more than 20% पर्सेंट लोग सीधा वेबसाइट बंद कर देते हैं। फिफ्टी पर्सेंट लोग वापस उस restorent में नहीं जाते जहां खाना खाने के लिए उन्हें थोड़ा वेट करना पड़ता हो। ऐमजॉन को एक स्टडी से पता चला कि अगर उनकी वेबसाइट को खुलने में कुछ सेकंड्स देर हो जाती है तो उनका वन पॉइंट सिक्स बिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है, हर साल।

अब ये सारे एग्जाम्पल देके मैं आपको बस ये दिखाना चाहता हूं कि आजकल हम कितने distracted हो के लाइफ जीने लगे हैं। और कुछ ऐसा ही हुआ था केनेडियन ऑथर और प्रोडक्टिविटी कंसल्टेंट क्रिश बेली के साथ।

क्रिश कहते हैं कि उनकी लाइफ सीरीज ऑफ स्क्रीन बन चुकी थी। यानी कि सुबह से लेकर रात तक वे स्क्रीन के सामने ही रहते थे। उड़ते वक्त ही अपने मोबाइल की स्क्रीन, ऑफिस में कंप्यूटर की स्क्रीन, टाइम देखने के लिए उनकी स्मार्ट वॉच की स्क्रीन, घर से ऑफिस ट्रैवल करते वक्त बिलबोर्ड की स्क्रीन, और न जाने कितनी स्क्रीन्स उनकी अटेंशन को खा रही थीं।

लेकिन ऑथर अपने आपको बदलना चाहते थे इसीलिए वो सालों तक वर्ल्ड वाइड घूमे। फोकस और अटेंशन के ऊपर काफी रिसर्च करी। साइंटिस्ट और एक्सपर्ट से मिलें और बुक लिखी Hyperfocus।

Hyperfocus Point 1: Your attention is most precious commodity in this world

Hyperfocus का पहला प्वाइंट कहता है कि,
Your attention is most precious commodity in this world.

यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के प्रफेसर और साइकॉलजीस्ट Timothy Wilson के अकॉर्डिंग ह्यूमन ब्रेन अपने एनवायरमेंट से हर सेकंड 11 मिलियन बिट्स ऑफ इन्फर्मेशन रिसीव करता है। लेकिन उसमें से हर सेकंड 40 बिट्स ऑफ इन्फर्मेशन ही आखिर में प्रोसेस कर पाता है। इसका मतलब हमारे ब्रेन का भी एक लिमिटेड अटेंशन बेस होता है।

अटेंशन स्पेस मतलब किसी भी चीज पर फोकस करके उसे प्रोसेस कर पाने की हमारी मेंटल कपैसिटी। अटेंशन स्पेस को ऑथर ह्यूमन ब्रेन की रैम भी कहते हैं। जैसे आपके स्मार्टफोन में जितनी ज्यादा रैम होगी वो उतनी ही बड़ी अप्लीकेशंस को बिना हैंग हुए हैंडल कर पाएगा। सिमिलरली आपके ब्रेन का अटेंशनल स्पेस जितना ज्यादा होगा उतना ही ज्यादा फोकस से आप अपने जरूरी कार्य को कंप्लीट कर पाओगे।

हमारा aim होना चाहिए अपनी अटेंशन स्पेस को बढ़ाना और जरूरत के अकॉर्डिंग अच्छी नींद लेना भी हमारी अटेंशन स्पेस को 58 परसेंट तक इंक्रीज कर सकते हैं।

ऑथर कहते हैं कि अगर आप एक घंटा नींद कम लेते हों तो आप अगले दिन की दो घंटे की प्रोडक्टिविटी खो रहे हों। आप अपने अटेंशन स्पेस में जितने ज्यादा task भरते जाओगे उतने ही आप distracted होते जाएंगे। इसीलिए जब बात हो आपकी प्रोडक्टिविटी की तो जितनी कम चीजों को आप अपना टेंशन दोगे उतने ही आप प्रोडक्टिव बनते जाओगे।

Hyperfocus Point 2: Practice Low Stimulation

लोगों को लगता है कि हमारा दिमाग डिस्ट्रैक्ट है। पर रिसर्च के अकॉर्डिंग हमारा दिमाग डिस्ट्रेक्टेड नहीं लेकिन ओवर स्टिमुलेटेड होता है। हमें लोगों की इंस्टाग्राम स्टोरीज देखनी हैं और हमारी फोटोज में कितने लाइक्स मिले वो भी चैक करना है।

हमें ये भी देखना है हमें वो भी करना है मतलब हमारे ब्रेन को हमेशा नई इंफॉर्मेशन चाहिए। नया एक्सपीरियंस चाहिए और ब्रेन के इस मैकेनिज्म को ऑथर नॉवेल्टी वाइस कहते हैं। जैसे हमारी बॉडी को अच्छे से फंक्शन करने के लिए फूड की नीड होती है और जो भी हम डेली खाते हैं उससे हमारी बॉडी बनती है, वैसे ही हम अपने माइंड के लिए कंटेंट कंज्यूम करते हैं।

अगर आप देखो तो सालों पहले लोग अपने इंटरटेनमेंट के लिए नोवेल्स पढ़ते थे जिसे पूरा करने में उन्हें काफी हफ्ते लगते थे जिससे लोगों को उस एक ही नॉवेल पर बहुत लंबे टाइम तक फोकस करना पड़ता था। इसी लिए उस टाइम पर लोगों का अटेंशन और फोकस करने की एबिलिटी भी बहुत अच्छी हुआ करती थी।

लेकिन स्टडीज कहती है कि लोगों का अटेंशन साल दर साल कम होता जा रहा है जो सच भी है। क्योंकि बुक्स के बाद लोग टीवी देखने लगे मूवीज देखने लगे जिससे डोपामिन रिलीज करने के लिए उन्हें सिर्फ तीन घंटे ही चाहिए। लेकिन अब एक्स्ट्रा फनी, एक्स्ट्रा स्टिमुलेटिंग, फन टू वॉच कॉन्टेंट जैसे मेम्स, रील और शॉर्ट विडियोज ने लोगों के दिमाग को खोखला बना दिया है।

क्योंकि ऐसे कॉन्टेंट से हर सेकंड आपके दिमाग को डोपामिन का डोज मिलता है और आपका ब्रेन हर कुछ सेकंड बाद स्टिमुलेट होता रहता है और जब भी आप कोई इम्पॉर्टेंट काम करते हो तो आप बोर होने लगते हों क्योंकि आपके दिमाग को हर कुछ सेकंड में स्टिमुलेट होने की आदत हो गई होती है।

जिससे वो अपने आप को स्टिमुलेट करने के लिए डिस्ट्रक्शन ढूंढता है। जो आपने भी देखा होगा कि जब भी आप पढ़ाई करने बैठते हों तभी आपको बाजार के सारे काम याद आते हैं क्योंकि आपका दिमाग हर सेकंड में स्टिमुलेट होना चाहता है। इसीलिए वो आपको पेंडिंग काम याद दिला के आप डिस्ट्रैक्ट करने की कोशिश करता है।

एक स्टडी से पता चला है कि एक टीनएजर इंस्टग्राम की एक पोस्ट पर 10 सेकेंड स्पेंड करता है। और इसके एक सिंगल स्वाइप करने पर ही हजारों नई चीजें उसके दिमाग को स्टिमुलेट करने के लिए तैयार होती हैं। इसी हैबिट से लोगों का दिमाग ओवर स्टिमुलेट रहता है और ओवर स्टिमुलेट ब्रेन ही ईजिली डिस्ट्रेक्टेड हो जाता है।

क्रिश बेली कहते हैं कि किसी भी चीज पर आप हाइली फोकस होंगे तभी काम कर पाओगे जब आपका दिमाग low स्टिमुलेट हो। मतलब आपमें खुद को बोर करने की कपैसिटी हो।

Hyperfocus के ऑथर ने खुद को ज्यादा बोर करने के लिए कई अनोखे काम किए जैसे एक दिन उन्होंने एक घंटे तक एपल के terms and conditions पढ़े जो शायद ही कोई पढ़ता हो। एक दिन उन्होंने पाई के फर्स्ट 10000 डिजिट्स में जीरो काउंट करते हुए बताया, तो एक दिन उन्होंने 250 ग्राम चावल में कितने दाने होते हैं वो गिने। ऐसे ही बोर कर देने वाली चीजें वह एक महीने तक करते रहे। इसके बाद ऑथर ने नोटिस किया कि उनका अटेंशन स्पान बढ़ गया है।

ऐसा इसलिए नहीं था कि उनके आसपास बहुत कम डिस्ट्रैक्शन थे बल्कि ऐसा इसलिए था क्योंकि अब उनका दिमाग बहुत लो स्टिमुलेटेड रहता था और अपने आप को लो स्टिमुलेटेड रखने का बेस्ट तरीका है अपने मीडिया कंजम्प्शन के लिए कुछ स्टैंडर्ड सेट करना। जैसे किसी भी ऑडियो विडियो या लिंक खोलने से पहले थोड़ा सोचें कि क्या सच में मुझे ये इन्फॉर्मेशन चाहिए या मैं अपने इमोशंस के बहकावे में ही यह देख रहा हूं।

Hyperfocus के ऑथर कहते हैं कि ऑटो पायलट मोड में जीना बंद करो और बोरियत को सहना सीखो गाने और पटकथा सुने बिना ही वर्कआउट करें। कभी बिना न्यूज़ पढ़े ही दिन बिताओ और कुछ दिन यू ट्यूब पर वीडियो देखना ही बंद कर दो और देखो कि क्या आप उस बोरियत को सह सकते हो। अगर हां तो कोई भी डिस्ट्रक्शन आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगी।

Hyperfocus Point 3: Doing Nothing is not a waste of time

ऑथर बोलते हैं कि जिस तरह hyperfocus हमारे दिमाग का सबसे प्रोडक्टिव मोड है उसी तरह जिस मोड में हमारा ब्रेन सबसे ज्यादा क्रिएटिव होता है उसे scatterfocus मोड बोलते हैं। देखो ये भी एक fact हैं की मैक्सिमम ग्रेट आइडियाज और प्लांस जो लोगों के दिमाग में आते हैं वो उन्हें सोचते वक्त नहीं आते बल्कि तब आते हैं जब वो कोई दूसरे काम कर रहे हों।

एग्जाम्पल न्यूटन को ग्रेविटेशनल फोर्स का आइडिया तब आया जब वो पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे और ऐसे ही कई ग्रेट लोगों को ग्रेट आइडिया नहाते वक्त, बर्तन साफ करते वक्त और बाथरूम में बैठते वक्त भी मिले हैं।

इसीलिए scatterfocus मोड भी यही बोलता है कि दिन में एक बार mindless एक्टिविटी भी जरूर करें। जैसे वॉक पे जाना, घर की सफाई करना, अपनी फेवरिट डिश कुक करना या फिर बैठे बैठे लोगों को ऑब्जर्व करना। ऐसी चीजों से आपका दिमाग फ्री होता है और वो पास्ट में सीखी चीजों के नोट्स को बैकग्राउंड में कनेक्ट करता है। यही रीजन है कि आपकी कुछ प्रॉब्लम्स से सॉल्यूशन आपको अचानक ही मिल जाते हैं जिसे यूरेका इनसाइट भी कहते हैं।

Hyperfocus के ऑथर कहते हैं कि हर शाम को एक disconnection ritual लो। ऑथर का फेवरेट डेली रिचुअल है कि वो शाम 8 बजे से सुबह 8 बजे तक इंटरनेट यूज नहीं करते। उनका और उनकी वाइफ का एक वीकली डिस्कनेक्शन रिचुअल भी है वो दोनों हर संडे को डिजिटल दुनिया से टोटली डिस कनेक्टेड रहते हैं जिससे वो नेचर और फैमिली के साथ टाइम बिता सकें। आपने देखा होगा कि कुछ लोग पूरा दिन बस अपने मोबाइल में ही घुसे रहते हैं जो ऑथर को जरा भी पसंद नहीं है।

इसीलिए जब भी वह किसी के साथ डिनर पर जाते हैं तो वह फोन स्वैप टेक्निक यूज करते हैं मतलब अपना मोबाइल सामने वाले को दे देते है और और सामने वाले का मोबाइल खुद के पास रखते हैं। जिससे दोनों पर्सन अपने मोबाइल से डिस्ट्रिक्ट हुई है बिना ही एक दूसरे को ज्यादा इंपोरेट्स दे पाते है।

Hyperfocus के ऑथर कहते हैं कि हमारा अटेंशन ही हमारी जिंदगी बनाता है। अगर हम हर सेकंड डिस्ट्रैक्टेड है और हमारा दिमाग ओवर स्टिम्युलेटेड है तो हम ऐसी लाइफ क्रिएट करेंगे जो बहुत डिस्ट्रैक्टेड हो। लेकिन जब हम बोर होना सीख लेंगे जब हम लोग स्टिम्युलेटेड बन जाएंगे तब ना सिर्फ हमें प्रोडक्टिविटी फोकस और आइडियाज जैसी चीजें मिलती है बल्कि इसकी वजह से हम बेहतर जिंदगी भी जी सकते हैं।

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